Blissful Life by Krishna Gopal

Letter 02: Spirituality Quiescent (to know the creator of the universe and its creation)

DigitalG1 Letter

प्रिय बच्चों (ईशा, हर्षित, आस्था, संज्ञा),

पिछले पत्र में हमने SQ के बारे में जाना, इसी को आगे बढ़ाते हुए अब हम और गहराई में जानने की कोशिश करेंगें।
What is ‘S’ in SQ? ‘S’ stands for “Spirituality” (आध्यात्मिकता) and we know the meaning of ‘Q’.
Spirituality means to know yourself (स्वयं को जानना). इस सृस्टि में तीन चीजें हैं :
  1. परमपुरुष (परम आत्मा या रचयिता, GOD)
  2. जीवआत्मा (हम मनुष्य, Soul + Body)
  3. पर्यावरण (प्रकृति, Environment)
God को सब जानते हैं परन्तु इस पर चर्चा बाद में करेंगे। बस इतना समझ लो वो इस ब्रह्माण्ड (Universe) का रचयिता है।
(परमात्मा) हम आत्माओं की तरह ज्योति स्वरूप है, अमर है, अजर है, अविनाशी है (शरीरधारी नहीं है)। हम आत्माएं उसकी रचना हैं।
अतः इस Creator और उसके Creation को जानना ही Spirituality है। यदि इसकी सही सही जानकारी हो जाये तो सारे भ्रम व मन का भटकना बंद हो जाये।
निचोड़ यह है कि “To have a clear and correct knowledge of Creator and its Creation is Spirituality.”
हम उसे अब आगे GOD नहीं कहेंगे, उसे “बाबा” शब्द से सम्बोधित करेंगे क्योंकि वो हमारे पिताओं का भी पिता है। शरीर के पिता तो बदलते रहते हैं, पुनर्जन्म के कारण परन्तु आत्मा का पिता कभी नहीं बदलता है। आत्मा अविनाशी है।

परमात्मा की सही पहचान – अर्थात परमात्मा किसे कहेंगे?

1. जो सर्वमान्य हो, जिसे सब धर्म वाले स्वीकार करें –

उसके नाम अलग अलग हो सकते हैं, जैसे अल्लाह, ईश्वर, खुदा, GOD, भगवान इत्यादि।

2. जो सर्वोच्च हो, सर्वश्रेष्ठ हो, परम हो –

उसके ऊपर कोई नहीं, वो अजन्मा है, न उसके माता–पिता न गुरु–शिक्षक हो। इसलिए कहा जाता है – ऊँचा तेरा नाम, ऊँचा तेरा धाम, ऊँचा तेरा काम, ऊँचे से ऊँचा है भगवान।

3. जो सबसे न्यारा हो –

जो सबसे प्यारा हो, जन्म–मरण, कर्मफल, पाप–पुण्य, सुख–दुःख से न्यारा हो, सतो, रजो, तमो से भी न्यारा (हमेशा एक समान), सर्व बन्धनों से मुक्त, सबसे ऊँचा और उसके समान भी कोई न हो।

4. जो सर्वज्ञ हो –

सब कुछ जानता हो। बेअंत हो। जेसे “हरी अनंत हरी कथा अनंता”।

5. जो सर्वगुण, सर्वशक्तिमान हो –

दाता हो, किसी से लेने वाला नहीं, सर्वगुणों का सागर।

अतः साकारी देहधारी व्यक्ति भगवान नहीं हो सकता, क्योंकि फिर उसके माता, पिता और गुरु होंगे।
I hope it is very clear. Is there can be any other definition of GOD? I think No.

One Universe, One World One GOD (बाबा)
(There cannot be two or more GOD)

परमात्मा का सत्य परिचय

जब तक हम उसका सही परिचय नहीं जानेंगे तो उससे जुड़ेंगे कैसे? हमारी बात उस तक नहीं पहुँच पायेगी तो वो हमारी मदद कैसे करेगा? और फिर लोग कहते हैं कि अब तो वो भी हमारी नहीं सुनता।

1. नाम –

चूँकि वो निराकारी है, उसका शरीर नहीं है, तो उसका नाम उसके गुणों के आधार पर रख दिया है। वो सबका कल्याण करने वाला है अर्थात शिव (कल्याणकारी)।
उसको सदाशिव भी कहते हैं अर्थात सदा कल्याणकारी।

2. रूप –

ज्योति स्वरूप, सूक्ष्म से सूक्ष्म सूक्ष्मातीत, हजारों सूर्यों से ज्यादा तेजोमय। जिसे केवल दिव्य चक्षु द्वारा ही देखा जा सकता है। अशरीरी, कोई हाथ नहीं, कोई पैर नहीं।

3. धाम –

परमधाम या ब्रह्मलोक, शिवपुरी, शान्तिधाम या परलोक भी कहते हैं। इस स्थूल जगत से दूर, प्रकृति के पाँच तत्वों से दूर, तारों, चन्द्रमा व सूर्य से भी दूर, एक छठा तत्व जिसे अखण्ड ज्योति ब्रह्ममहतत्व कहते हैं। इसलिए कहा जाता है, ऊँचा तेरा नाम, ऊँचा तेरा धाम, ऊँचा तेरा काम (सर्वोच्च)।

4. गुण –

ज्ञान, पवित्रता, शांति, आनंद का सागर, सर्वशक्तिमान, पतित पावन, सुखदाता, दुःखहर्ता, मुक्ति, जीवन मुक्तिदाता, गति, सद्गति दाता… आदि।
उसकी शरण लेने व उसकी आज्ञाओं के अनुसार चलने से ही मनुष्य आत्माओ का कल्याण हो सकता है, अन्यथा नहीं।

5. कर्तव्य (दिव्य है) –

उसने सबसे पहले तीन देवताओं की रचना की – ब्रह्मा, विष्णु, महेश (शंकर)। तीनों साकारी हैं।
गीता में भी इसका वर्णन है। प्रजापिता ब्रह्मा के तन में प्रवेश कर ज्ञान द्वारा सतयुग की स्थापना करना। शंकर द्वारा कलियुगी सृष्टि का महाविनाश करना (पूर्ण विनाश नहीं होता है), जिसके फलस्वरूप मनुष्यात्मा देह से मुक्त होकर धर्मराजपुरी में अपने पापों या विकारों का दण्ड भोगकर परमधाम में आत्मारूप में चली जाती हैं जो आत्माओं और परमात्मा का मूल निवास है। कुछ समय तक परमधाम में रहने के पश्चात, अपनी merit अनुसार सतयुग व त्रेता युग में चली जाती हैं। जहाँ वें 21 जन्मों तक सतयुग व त्रेता युग में राज्यभाग्य व सुख भोगती हैं।

स्वयं को जानना (To Know Yourself)

मैं कौन हूँ? –

हम सारे दिन अपनी बातचीत में कहते हैं “मैंने यह काम किया, मैं फला जगह रहता हूँ… आदि। परन्तु यह मैं मैं कहने वाला, मैं कौन हूँ? इसे नहीं जानते।
मैं और मेरा (I and mine) वास्तव में दो अलग अलग शब्द हैं। मैं एक आत्मा हूँ और मेरा शरीर उसके रहने का स्थान है। हम यह नहीं कह सकते कि मैं हाथ हूँ, मैं आँख हूँ, मैं मुँह हूँ। हम कहेंगे मेरा हाथ, मेरी आँख, मेरा मुँह…। तो मैं आत्मा हूँ न कि शरीर (जैसे मेरा शरीर)। मैं एक चेतन शक्ति हूँ जो आँख द्वारा देख सकती है, कानों द्वारा सुन सकती है, मुख द्वारा बोल सकती है। मैं इन सबकी मालिक हूँ, जो अनादि व अविनाशी है। जबकि शरीर विनाशी है, जो हमें कर्म करने व भोगने के लिए मिलता है जिसे जीवात्मा (जीव + आत्मा) कहते हैं। आत्मा जब शरीर छोड़ती है तो यह शरीर मुर्दा कहलाता है। People say the light is gone. The Game is over.
आत्मा जब शरीर छोड़ती है अर्थात मृत्यु होती है उस समय कोई रोता है तो उसे रोका जाता है, इसलिए कि रोने से आत्मा अशांत न हो जाये। बल्कि आत्मा को शांति देने कि प्रार्थना करते हैं।
आत्मा का स्थान शरीर में भ्रकुटि के स्थान पर होता है (जहाँ तिलक लगाया जाता है)। माथे पर तिलक लगाने का भी यही कारण है।
आत्मा एक अति सूक्ष्म ज्योति बिंदु है। आत्मा प्रकृति के पाँच तत्वों (पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश) से नहीं बनी होती है। यह एक छठा तत्व है, जिसे अखण्ड ज्योति ब्रह्ममहतत्व कहते हैं। आत्मा अनादि व अविनाशी (कभी न नष्ट होने वाली) है।
इसी प्रकार परमआत्मा अर्थात परमात्मा (GOD) भी छठे तत्व से निर्मित है। आत्मा व परमात्मा का वंश एक ही है। परमात्मा का शरीर नहीं होता, न ही वो पुनर्जन्म में आते हैं। आत्मा जीवआत्मा के रूप में आती जाती रहती है। अतः आत्मा परमात्मा का पिता पुत्र का सम्बन्ध है।
मन, बुद्धि और संस्कार आत्मा ओर की शक्तियाँ हैं।

सार –

मैं एक आत्मा हूँ। मैं शरीर नहीं हूँ। मैं शरीर में हूँ। आत्मा अमर है, स्थायी है। शरीर अस्थायी है अर्थात बदलता रहता है।
हमारे दो पिता हैं, एक जिनके द्वारा हमें यह शरीर मिला है। इन्हें लौकिक माता पिता कहेंगे। हर जन्म के अनुसार लौकिक माता पिता बदलते रहते हैं। आत्मा का पिता जिसे परमात्मा कहते हैं, अलौकिक पिता है, जो कभी नहीं बदलता है, सदा सदा साथ रहता है, मरने के बाद और मरने से पहले भी। उसे परमपिता या पिताओं का पिता या बाबा भी कहते हैं।
हम आत्माओं का पिता (परमपिता या GOD) परमधाम निवासी हैं। जिसे परमधाम, शान्तिधाम, निर्वाणधाम, मुक्तिधाम, परलोक या ब्रह्मलोक भी कहते हैं।
अतः हम आत्मा भी परमधाम निवासी हैं। इस सृष्टिमंच पर हम एक यात्री के रूप में आये हैं और अपनी यात्रा समाप्त कर वापस अपने वतन चले जायेंगे। हम सबके पास वापसी का टिकट है।
हमें यह यात्रा जबरदस्ती नहीं बल्कि जबरदस्त तरीके से perform करनी है।
जिंदगी के सफर में हम जीतते हैं या सीखते हैं पर हारते कभी नहीं हैं।

With lots of Love & Affection

Dada
Krishna Gopal

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