Blissful Life by Krishna Gopal

सदगुरू द्वारा ही परमात्मा की प्राप्ति सम्भव है

DigitalG1 Meditation
परमात्मा सदगुरू के माध्यम से हमें स्वराज्य (स्वयं पर राज करने वाला) अधिकारी बनाते हैं, जैसे कि लौकिक परिवार में हर एक माँ बाप बच्चों को कहते हैं कि “मेरा बच्चा राजा बेटा है” अर्थात वो इच्छा रखते हैं कि उनका बच्चा राजा बने। जब हम कहते हैं कि मेरा संसार ही मेरा भगवान है, दूसरा कोई नहीं तो स्वतः ही योगी की स्थिति बन जाती है उसके लिए Extra मेहनत की जरूरत नहीं पड़ती। चेहरे की चमक बढ़ जाती है। हाँ इसके लिये त्याग बहुत करना पड़ता है जिसे मेहनत (पुरूषार्थ) कहते हैं।
सदगुरू निरन्तर योग कैसे लगायें यह सिखलाते हैं। सदगुरू कहते हैं सारा समय युद्ध में नहीं गवाँना है (अर्थात मेहनत में) अब प्राप्ति का समय आ गया है। प्राप्ति का अनुभव करना है। जब हम आत्माओं का एक ही पिता है (यह समझ लिया) तो फिर जायेंगे कहाँ, उनके साथ ही रहेंगे तो फिर प्राप्ति ही प्राप्ति हैं।
सदगुरू – “मनमनाभव, मध्याजीव का वरदान देते हैं। जिसका अर्थ है, मन को भटकने न दो और मुझ एक को ही याद करो तो तुम ‘म्ध्याजीव भव’ अर्थात पापों से मुक्त होकर परमशान्ति तथा परम सुख को प्राप्त करोगे।”
स्वदर्शन चक्र चलाते रहो। जब बुद्धियोग कहीं और जाये, तुरन्त उसे मोड़कर अन्य किसी श्रेष्ठ चिंतन में लगा दो। मगर इसके लिये ज्ञान का भण्डार होना आवश्यक है क्योंकि मन भटकने के तीन कारण होते हैं, जहाँ वो जाता है –
  1. सम्बन्धों में
  2. इच्छाओं में
  3. किसी परिस्थितिवश भयभीत होने पर।
1. मन जब सम्बन्धो में जा रहा हो तब आत्म बिन्दु लगा दो (मैं भी आत्मा वो भी आत्मा)
2. मन जब इच्छाओं के पीछे जा रहा हो तब परमात्मा बिन्दु लगाओ (मुझे सदगुरू द्वारा परमात्मा की प्राप्ति हुई है जो सर्व खजानों से बड़ा है, उसके सामने यह तुच्छ खजाने (इच्छायें) क्या चीज हैं, अर्थात परमात्मा से जो प्राप्ति हुई है उनको याद करो।)

3. यदि कोई भयभीत करने वाली बात हो तो उस समय ड्रामे का बिन्दु लगाओ। ड्रामे में जो होगा अच्छा ही होगा, बुरा हो ही नहीं सकता। क्योंकि ड्रामे का हर पल कल्याणकारी है। परमात्मा कल्याणकारी, सदगुरू कल्याणकारी, तो मेरा अकल्याण हो ही नहीं सकता। मैं एक श्रेष्ठ आत्मा हूँ, परमात्मा की सन्तान हूँ।

बिन्दु लगाने का अर्थ है, आत्मिक स्थिति में हो जाना। करन करावनहार परम पिता परमात्मा है। तब ड्रामे का हर सीन एक खेल लगेगा।
हाँ एक बात अत्यन्त महत्वपूर्ण है वो है, “जिन्दगी के सबक आसानी से नहीं सीखे जा सकते, उसके लिये धैर्य की भी आवश्यकता पड़ती है”।
आध्यात्मिक उन्नति के लिये हमने कितना समय लगाया इससे ज्यादा खास बात है कि हमने कितना सीखा या केवल समय ही व्यतीत किया। यदि समय की ही गिनती करते रहेंगे तो असफलता ही हाथ लगेगी। अक्सर हम यही करते हैं, हर चीज हमें मन-मुताबिक चाहिये होती है। परन्तु ब्रह्माण्ड इस तरह काम नहीं करता, प्राप्ति तभी हासिल होती है जब हम उनके लायक तैयार हो जाते हैं।
कहावत है “First Deserve, then Desire” हमें यह समझने की जरूरत है कि हर समय हर काम के लिए उपयुक्त नहीं होता, सही समय का इन्तजार बहुत जरूरी है।
ज्ञान प्राप्त करने के लिये धैर्य रखना परम आवश्यक है। यदि हम अधीर हो जायेंगे, तो स्वयं तो स्वयं औरों के लिये भी परेशानियाँ खड़ी कर देंगे। बिना सोचे समझे गलत अर्थ निकाल लेंगे। और उसकी हमें कीमत चुकानी पड़ेगी। इसलिये कहा जाता है, सदगुरू की मत पर ही चलना चाहिये।

With lots of Love & Affection

Dada
Krishna Gopal

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