Blissful Life by Krishna Gopal

साक्षात्कार – स्वयं से

DigitalG1 Meditation
हम चाँद, सितारों, ग्रहों की दूरी तथा समुद्र की गहराई की खोज करते हैं, परन्तु हम कौन हैं तथा इस संसार में क्यों आये हैं? इस बारे में कितना जानते हैं, कोशिश कीजियेगा जीवन के रहस्यों पर से परदा उठ जायेगा और जीवन सुखद बन जायेगा।
एक महान दार्शनिक के अनुसार –
तुम अपने को परमात्मा (ईश्वर) तो नहीं कह सकते लेकिन परमात्मा से (जुड़) एकात्मता का अनुभव तो कर सकते हो। पानी की एक बूँद सागर नहीं हो सकती लेकिन यह सागर से ही निकलती है और इसलिये इसमें सागर से सारे गुण हैं। हम इस तथ्य को भूलते जा रहे हैं।
यह ऐसा ही है जैसे कोई दरिद्र व्यक्ति सड़कों पर ठोकरें खाने के लिये बाध्य हो, उसे खाने के लिये भी लाले पड़े हों और उसे इस बात का पता ही नहीं कि उसके नाम कहीं एक खाता भी खुला है जिसमें लाखों करोड़ों रु० उसकी राह देख रहे हैं।
सृष्टि के नियमों के अनुसार सभी वस्तुएँ व व्यक्ति कभी न कभी हमारा साथ छोड़ देंगी। आने जाने का क्रम (चक्र) चलता ही रहेगा लेकिन जब हम उन पर निर्भरता की शर्त छोड़ देंगे तो उनके खोने का डर नहीं सताएगा और जीवन की सरिता स्वाभाविक गति से बहती रहेगी। तथा ईश्वर या परमात्मा की कृपा हमारे जीवन में होती रहेगी बल्कि सामान्य से ज्यादा क्योंकि हम ईश्वर के अधिक कृतज्ञ (आभारी) होंगें। कठिनाई यह है कि हमें जो ईश्वर से मिलता है या मिला है हम उसके प्रति कृतज्ञ होने के बजाय शिकायत के रूप में और अधिक की माँग करने लगते हैं। चाहे वह भले ही जरूरी न हो। ख्याल रहे जो चीजें हमारे पास नहीं हैं वें एक ख्वाब हैं और जो चीजें हमारे पास हैं वें लाजवाब हैं।

भागवत गीता के अनुसार “जो मिले उसमें संतुष्ट रहते हुए कृतज्ञ भाव से कर्म करते रहो तो प्रभु की कृपा स्वयं मिलती रहती है।” जब असंतुष्ट व्यक्ति अधिक की चाह में शिकायत भरी माँग करने लगता है तो वो कृतज्ञ नहीं हो सकता और यदि आप कृतज्ञ नहीं हैं तो प्रभु कृपा कैसे होगी। इसके लिये मन को समझाना या समझना अत्यंत आवश्यक है।

साधना मार्ग में तीन तरह की बाधाएँ आती हैं जिसके कारण व्यक्ति आत्मा को (ज्योति स्वरूप) परमात्मा से नहीं जोड़ पाता।
पहली बाधा है शरीर, यह स्थूल है, इसके भीतर हैं विचार और उसके भीतर है मन
शरीर – शरीर हमें दिखाई देता है। इसको हमने नहीं बनाया यह कुदरत की सौगात है। शरीर साधना का प्रथम साधन है।
यह उस समय बाधा बन जाता है जब स्वयं को आत्मा मानने लगता है। जिस प्रकार कार और उसका चालक अलग-अलग हैं उसी तरह शरीर और आत्मा भी अलग-अलग हैं। आत्मा शरीर को चलाती है।
दूसरी बाधा है विचार जो शरीर से भी (बहुत) सूक्ष्म है। हम जैसा जैसा विचार करते हैं शरीर वैसा वैसा ही करता है। शरीर तो बेचारा गुलाम है, जिसे तुम मंदिर ले जाओ चाहे मदिरालय। मूल दोष व्यक्ति के विचारों का है। विचार बहुत बड़ी बाधा है लेकिन उससे भी बड़ी बाधा है मन जो विचारों की जन्मस्थली है।
व्यक्ति का जाग्रत मन विचार है और सोया मन (sub-conscious mind) चित्त या वृत्ति है। चेतन (जाग्रत) मन में ही विचार उत्पन्न होते हैं और (सोया मन) अवचेतन में (चित्त में) एकत्रित होते रहते हैं। अतः व्यक्ति की साधना में सबसे बड़ा बाधक उसका मन है, क्योंकि मन के आदेशानुसार ही इन्द्रियाँ शरीर के साथ मिलकर उसका पालन करती हैं।

मन को कैसे समझाएँ

मन से लड़ना नहीं है, दुश्मनी के बजाय दोस्ती का भाव रखना है, उसे बड़े प्यार से शांत भाव व ध्यान से एक मित्र की भाँती सुनना है।
जैसा की मेरा अनुभव रहा है हम उसे अकड़ से नहीं झुका सकते, वह झुकने वाला नहीं है क्योंकि मैं अर्थात अहंकार उसे झुकने नहीं देता। प्रेम में जादू है, प्रेम जोड़ता है और अहंकार (चालू भाषा में मन कह सकते हैं।) तोड़ता है।
उदाहरण – मान लीजिये बाजार में हलवाई की दूकान पर गरम-गरम जलेबी देखकर मन में खाने की इच्छा (कामना) हुई, उस समय यदि मन को डांटा “तुझे तो हमेशा कुछ न कुछ चाहिये, चलो हटो।” उस परिस्थिति में मन और लड़ेगा, जिद करेगा, झुकेगा नहीं। और यदि हमने मन को प्यार से समझाया “अच्छा जलेबी खानी है, जरूर खायेंगे परन्तु चलो पहले जरूरी काम तो कर लें (जिसके लिये बाजार आये हैं)।” मन बेचारा भोला है मान जायेगा और जब तक अन्य कार्य कर के आयेंगे तो शायद तब तक वो जलेबी खाना भूल चुका होगा। फिर वो लड़ेगा नहीं समझौता कर लेगा। कहावत है “मन तो बच्चा है” । यह है प्रेम का जादू। ऐसे कई उदाहरण दिये जा सकते हैं।

With lots of Love & Affection

Dada
Krishna Gopal

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